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Showing posts from May, 2020

सत्य की खोज, भाग दो: धार्मिक विश्वास का पृष्ठभूमि-काल :

भूख और असुरक्षा के निस्तारण की प्रकृया में, मनुष्य का आसमानी शक्तियों की ओर झुकाव उसकी अक्षमता के कारण हुआ या अत्यधिक क्षमता के कारण ? क्या यह हो सकता है कि अपने बुनियादी जरूरतों की खोज में आदिम मनुष्य ने पूरी धरती छान मारी हो और असफल होने पर आसमान की ओर देखना शुरु किया हो ? या क्या यह हो सकता है कि बुनियादी जरूरतों की खोज में अक्षम मनुष्य ने आसमान से याचना प्रारम्भ की हो ? मनुष्य प्रकृति में ही विकसित हुआ था और अपनी विकास-प्रकृया में ही उसे बुनियादी जरूरतों की पूर्ति करना पहले से ही आता था। उसे यह भी पता था कि बुनियादी जरूरतों की पूर्ति में अक्षमता का अर्थ जीवन से हाथ धो लेना है। फिर मनुष्य अगर आसमानी शक्तियों की ओर आकर्षित हुआ तो कैसे ? यह प्रकृया लगभग एक लाख पचास हजार वर्ष पूर्व प्रारम्भ हुई। मानव जाति की आठवीं पीढ़ी होमो इरेक्टस बहुत हद तक सभ्य हो चुकी थी। बहुत बड़े समूह के बदले यह पीढ़ी 20-25 की संख्या वाले पारिवारिक समूह में छत वाले एक घर में रहने लगी थी। भोजन पका कर खाया जाने लगा था और पशुपालन, वानिकी और कृषि का भी विकास हो चुका था। 20-25 की संख्या वाले कई पारिवारिक समूहों ने...

सत्य और उसकी खोज: भाग एक

सत्य क्या है ? क्या यह कोई ब्रह्माण्डिक पहेली है ? कोई विशिष्ट जिज्ञासा है ? जीवन से परे का कोई अलौकिक तत्व है ? या कोई पारलौकिक शक्ति ? क्या इसी की खोज में मानव सभ्यता पश्चिम से पूरब और पूरब से पश्चिम धरती का चक्कर काटती रही ? आध्यात्म, दर्शन, धर्म, कला ज्ञान, विज्ञान, और तकनीक, क्या इसी की खोज में अन्तर्युगीन यात्रा में निरन्तर संलग्न रहे ? और सबसे बड़ा सवाल यह कि इस सत्य की खोज क्यों ? इस धरती पर पहले मनुष्य की संभवतः पहली अनुभूति थी- भूख। (संभवतः इसलिए क्योंकि हो सकता है कि उसकी पहली अनुभूति तापमान रही हो।) मनुष्य ने पहले अनुभव किया, अनुकूलन किया, अनुश्रवण किया और प्रकाश की पहली किरण के साथ उसने प्रकृति को देखा। भूख चुनौती बन गई तो उसने उपाय सोचना शुरु किया। यह सोचना ही पहली प्रकृया थी जिससे मनुष्य सत्य की ओर चला। उसने खाद्य व अखाद्य का ज्ञान प्राप्त किया, शीत, ताप, असुरक्षा आदि से वचाव की तकनीक सीखा, सामाजिकता तथा सामुदायिक सहयोग की भावना विकसित की और इस तरह भूख और असुरक्षा से मुक्ति की एक ब्यवस्था कायम करने की कोशिश की।  भूख और असुरक्षा से रहित सुःखमय मानव-जीवन की स्थ...