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सत्य और उसकी खोज: भाग एक

सत्य क्या है ? क्या यह कोई ब्रह्माण्डिक पहेली है ? कोई विशिष्ट जिज्ञासा है ? जीवन से परे का कोई अलौकिक तत्व है ? या कोई पारलौकिक शक्ति ? क्या इसी की खोज में मानव सभ्यता पश्चिम से पूरब और पूरब से पश्चिम धरती का चक्कर काटती रही ? आध्यात्म, दर्शन, धर्म, कला ज्ञान, विज्ञान, और तकनीक, क्या इसी की खोज में अन्तर्युगीन यात्रा में निरन्तर संलग्न रहे ? और सबसे बड़ा सवाल यह कि इस सत्य की खोज क्यों ?

इस धरती पर पहले मनुष्य की संभवतः पहली अनुभूति थी- भूख। (संभवतः इसलिए क्योंकि हो सकता है कि उसकी पहली अनुभूति तापमान रही हो।) मनुष्य ने पहले अनुभव किया, अनुकूलन किया, अनुश्रवण किया और प्रकाश की पहली किरण के साथ उसने प्रकृति को देखा। भूख चुनौती बन गई तो उसने उपाय सोचना शुरु किया। यह सोचना ही पहली प्रकृया थी जिससे मनुष्य सत्य की ओर चला। उसने खाद्य व अखाद्य का ज्ञान प्राप्त किया, शीत, ताप, असुरक्षा आदि से वचाव की तकनीक सीखा, सामाजिकता तथा सामुदायिक सहयोग की भावना विकसित की और इस तरह भूख और असुरक्षा से मुक्ति की एक ब्यवस्था कायम करने की कोशिश की। 

भूख और असुरक्षा से रहित सुःखमय मानव-जीवन की स्थापना का यह विचार ही सत्य की पहली खोज थी। यह सत्य की पहली सर्वाधिक व्यावहारिक व्याख्या थी। मनुष्य का सत्य मानव जीवन से परे नहीं हो सकता। नव पाषाण काल तक का आदिम मनुष्य निरन्तर मानव-जीवन को बेहतर, और बेहतर बनाने के लिए सत्य की खोज में लगा रहा। यह सत्य की खोज प्रकृति से निरन्तर सामंजस्य बनाये रखते हुए प्रकृति में ही चलती रही।

आदिम मनुष्य ने नदी, पहाड़, समतल मैदान, जंगल, रेगिस्तान आदि सभी प्राकृतिक स्रोतों से मानव-जीवन के लिए उपयोगी तत्वों की तलाश की। प्रत्येक मौसम में उपयोगी वनस्पति उगाना सीखा और उपयोगी चीजों के निर्माण में मौसम का लाभ उठाया। इसीबीच एक अलग सोच भी विकसित हुई। मनुष्यों का एक समूह मानव-सत्य की खोज के बदले प्रकृति-सत्य के खोज की ओर प्रवृत्त हुआ और प्रकृति को नियंत्रित करने वाले आसमानी तत्वों की खोज में लग गया। पथभ्रष्टता का दौर यहीं से प्रारम्भ हुआ।

एकतरफ कितनी अच्छी यह पूर्ववर्ती सोच कि मानव-जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रकृति से संसाधन लिया जाय और दूसरी तरफ आत्मघाती यह सोच कि प्रकृति को नियंत्रित करने वाले आसमानी कारकों को प्रसन्न कर बिना मेहनत ही संसाधन बरसने की युक्ति की जाय। इस क्रम में आसमानी देवताओं की कल्पना के साथ धर्म के नये सत्य का उदय हुआ और इस नये सत्य ने मानव-जीवन को अंतहीन त्रासदी का वह उपहार दिया जिससे मानवता आज तक मुक्त नहीं हो सकी है।

Comments

  1. बहुत सुंदर सर 🙏

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  2. सत्य की खोज पर आप की खोज तर्क संगत है।वास्तव में प्राणिमात्र का हित जिसमें निहित हो वही सत्य है,जैसे दूध पीना स्वास्थ्य के लिए हितकर है यह एक सत्य है किन्तु जिसे अतिसार हो गया हो क्या यह सत्य उसके लिए भी सत्य होगा?निश्चित ही वहां सत्य की परिभाषा बदल जायेगी।
    दो प्रकार की सोच विकसित हुई एक तो उन प्राकृतिक सत्यों को संचालित करने वाले अदृश्य शक्तियों को प्रसन्न करने की,दूसरी इन अदृश्य शक्तियों पर विजय प्राप्त करने की वैज्ञानिक सोच जो रावण में थी,कहा जाता है कि इन सभी अदृश्य शक्तियों को इसनें बांध रखा था अथवा ये शक्तियां उसके इशारे पर काम करतीं थीं किन्तु यह भौतिक सत्य था जो पराजित हुआ।

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  3. आपको पहले ही पैरा से मेरे विचार पुर्णतया मिलते हैं,हलाकि बाद के मानव विकास की बात विषय पर पहुंचने की भुमिका लगी,
    उम्मीद है लेख सही दिशा में होगा

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