भूख और असुरक्षा के निस्तारण की प्रकृया में, मनुष्य का आसमानी शक्तियों की ओर झुकाव उसकी अक्षमता के कारण हुआ या अत्यधिक क्षमता के कारण ? क्या यह हो सकता है कि अपने बुनियादी जरूरतों की खोज में आदिम मनुष्य ने पूरी धरती छान मारी हो और असफल होने पर आसमान की ओर देखना शुरु किया हो ? या क्या यह हो सकता है कि बुनियादी जरूरतों की खोज में अक्षम मनुष्य ने आसमान से याचना प्रारम्भ की हो ? मनुष्य प्रकृति में ही विकसित हुआ था और अपनी विकास-प्रकृया में ही उसे बुनियादी जरूरतों की पूर्ति करना पहले से ही आता था। उसे यह भी पता था कि बुनियादी जरूरतों की पूर्ति में अक्षमता का अर्थ जीवन से हाथ धो लेना है। फिर मनुष्य अगर आसमानी शक्तियों की ओर आकर्षित हुआ तो कैसे ?
यह प्रकृया लगभग एक लाख पचास हजार वर्ष पूर्व प्रारम्भ हुई। मानव जाति की आठवीं पीढ़ी होमो इरेक्टस बहुत हद तक सभ्य हो चुकी थी। बहुत बड़े समूह के बदले यह पीढ़ी 20-25 की संख्या वाले पारिवारिक समूह में छत वाले एक घर में रहने लगी थी। भोजन पका कर खाया जाने लगा था और पशुपालन, वानिकी और कृषि का भी विकास हो चुका था। 20-25 की संख्या वाले कई पारिवारिक समूहों ने गाॅव जैसी सामाजिक संरचना भी विकसित कर ली थी। आपसी कम्यूनिकेशन की भाषा का विकास भी हो चुका था। बुजुर्ग नई पीढ़ी को अपना अनुभव भी बताने लगे थे और प्रत्येक समूह अपने पूर्वजों की कथा सुनने और स्मृतियों में संरक्षित भी करने लगा था। धार्मिक विश्वास की उत्पत्ति भी कुछ इन्हीं परिस्थितियों में हुई।
भोजन जैसी बुनियादी जरूरत के लिए जानवरों की खोज, उनके शिकार के तरीके और चुनौतियाॅ, घर बनाने की कला, आग जलाना और ईंधन के रूप में उसका प्रयोग, पशुपालन, वानिकी और कृषि आदि से संवंधित आवश्यक ज्ञान इस कालखण्ड के मनुष्य को अपने पूर्वजों से मिला था। इसके अतिरिक्त सुरक्षा-खतरा तथा मौसम का सटीक पूर्वानुमान और औषधीय हर्ब की पहचान व उसके प्रयोग के ज्ञान के लिए भी इस युग का मनुष्य अपने पूर्वजों का कृतज्ञ था। इस युग के मनुष्य ने अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान और उनकी कृतज्ञता का आभार प्रकट करने के लिए कुछ आयोजन करना प्रारम्भ किया। धीरे-घीरे पूर्वजों के प्रतीक भी अस्तित्व में आ गये और उन्हें सुपरनेचुरल ताकत की तरह देखा-समझा जाने लगा।
होमो इरेक्टस युग का मनुष्य एक घुमक्कड़ जीव भी था। इसके अफ्रीका से लेकर सम्पूर्ण यूरेशिया तक फैले होने के पर्याप्त प्रमाण हैं। विभिन्न भौगोलिक समूहों से मिलने और पूर्वजों के विषय में उनका ज्ञान साझा होने के बाद ज्यादा अलौकिक शक्तिसम्पन्न पूर्वज एक विशिष्ट सत्ता या आत्मा के रूप में पहचाने जाने लगे। उनके प्रतीकों को जीवित ब्यक्ति की तरह माना जाने लगा और जीवित ब्यक्ति की तरह ही उन्हें खाने-पीने की चीजें भी दी जाने लगीं।
इस विश्वास ने इस कालखण्ड के मनुष्य के अवचेतन हिस्से पर कब्जा जमा लिया। बीमार व अर्द्धमूर्छित लोग अपने अवचेतन में संरक्षित विश्वास को कभी आवाज के रूप में सुनने और कभी चित्र-रूप में देखने लगे। उस भ्रमचित्र से डरकर की गई ऊटपटांग हरकतों और तत्कालिक परिस्थिति के संयोजन से पूर्वज-विशेष का खुश होना या नाराज होना समझा जाने लगा। इसतरह क्रमशः उस विशेष पूर्वज को आत्मा या देवता माना जाने लगा।
फिर, मानव-विकास-क्रम की सर्वाधिक समझदार पीढ़ी होमो सेपियन्स का युग आया। होमो सेपियन उद्यमी मनुष्यों की पीढ़ी थी। उन्होंने ब्यवस्थित भाषा व चित्रात्मक लिपि का विकास किया, कपास के धागों से बुना वस्त्र पहनना आरम्भ किया और धातु के औंजार बनाये। इस युग के मनुष्य ने अपने पूर्वजों के प्रतीकों को मूर्ति का आकार दिया, उनकी प्रार्थना व आराधना के मंत्र लिखे और इसतरह लगभग पचास हजार साल पहले धर्म के पृष्ठभूमि की रचना की।
आदिम मनुष्य ने आसमानी शक्तियों के विषय में कभी नहीं सोचा। उसने हमेशा जमीनी और व्यावहारिक कल्पना की। अपने पूर्वजों के अतिरिक्त उसने कभी किसी आसमानी शक्ति को नहीं माना। आदिम मनुष्य ने पूरी धरती छानी, प्रयासों के असफल होने पर उसने नये प्रयास किये, और अपने बुनियादी जरूरतों की चीजें उसने धरती से ही खोज निकालीं। आदिम मनुष्य ने आसमान से कभी याचना नहीं की, बल्कि अपने पूर्वजों के अनुभव से सीखा और उसी क्रम में अपने अन्वेषण और श्रम से विकास के शिखर को छू लिया।
होमो सेपियन्स द्वारा विकसित धर्म के प्रारम्भिक देवता अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्र के मूल निवासियों के पूर्वज थे। सभ्यताओं के विघटन से मजबूर होकर अलग-अलग क्षेत्रों में आए पुजारी वर्ग ने षडयंत्रपूर्वक मूलनिवासियों के पूर्वजों को आसमानी देवता बना दिया।
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